इंडियन प्रीमियर लीग में जयपुर और गुवाहाटी को अपना घरेलू मैदान बनाने वाली राजस्थान रॉयल्स के फैंस के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 यादगार साबित हुआ। टीम के इन दोनों शहरों और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े खिलाड़ियों ने ग्लासगो में भारत के लिए शानदार प्रदर्शन किया।

राजस्थान, असम, मणिपुर और त्रिपुरा के खिलाड़ियों ने मिलकर भारत की झोली में सात पदक डाले, जिनमें तीन स्वर्ण, तीन रजत और एक कांस्य शामिल रहा। ग्लासगो 2026 में भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते।

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बुखार में भी स्वर्ण जीतने वाली मुक्केबाज से लेकर इतिहास रचने वाली जूडोका और लगातार तीसरी बार स्वर्ण जीतने वाली वेटलिफ्टिंग स्टार तक, राजस्थान और पूर्वोत्तर भारत के इन खिलाड़ियों ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अपनी अमिट छाप छोड़ी।

अरुंधति चौधरी (कोटा, राजस्थान)

स्वर्ण पदक - महिला 70 किग्रा मुक्केबाजी

अरुंधति चौधरी ने बीमारी से जूझते हुए भी ग्लासगो में भारत के सबसे शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई। बुखार होने के बावजूद कोटा की इस मुक्केबाज ने महिला 70 किग्रा फाइनल में इंग्लैंड की 2025 विश्व चैंपियनशिप कांस्य पदक विजेता चैंटेल रीड को हराकर स्वर्ण पदक जीता। इससे एक दिन पहले उन्होंने सेमीफाइनल में 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स चैंपियन वेल्स की रोजी एक्लेस को भी मात दी थी।

अरुंधति के पिता चाहते थे कि वह पढ़ाई पर ध्यान दें, लेकिन उन्होंने अपने परिवार को मुक्केबाजी के सपने का समर्थन करने के लिए मना लिया।

आसपास कोई प्रशिक्षित बॉक्सिंग कोच नहीं होने के कारण उन्होंने एक स्थानीय वुशु प्रशिक्षक से प्रशिक्षण लिया, जिन्होंने यूट्यूब वीडियो देखकर कोचिंग के तरीके सीखे थे। ऐसे हालात में कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण जीतना उनकी उपलब्धि को और भी खास बना देता है।

अस्मिता डे (बेलोनिया, त्रिपुरा)

स्वर्ण पदक - महिला 48 किग्रा जूडो

अस्मिता डे ने इतिहास रचते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय जूडोका (मेंस या वूमेंस) बनने का गौरव हासिल किया। उन्होंने महिला 48 किग्रा वर्ग के फाइनल में कनाडा की हाइडी क्वाच को रोमांचक गोल्डन स्कोर मुकाबले में हराकर खिताब अपने नाम किया।

त्रिपुरा के बेलोनिया में एक साइकिल मैकेनिक की बेटी अस्मिता ने अपने खेल जीवन की शुरुआत 800 मीटर दौड़ से की थी। बाद में उन्होंने जूडो को अपनाया।

पिता के सपोर्ट और खेलो इंडिया तथा भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) की प्रशिक्षण व्यवस्था से आगे बढ़ते हुए अस्मिता ने भारतीय जूडो के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक अपने नाम कर ली।

मीराबाई चानू (इम्फाल, मणिपुर)

स्वर्ण पदक - महिला 48 किग्रा वेटलिफ्टिंग

मीराबाई चानू ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह भारत की महानतम वेटलिफ्टरों में क्यों गिनी जाती हैं। उन्होंने महिला 48 किग्रा वर्ग का स्वर्ण पदक जीतकर लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स चैंपियन बनने का कारनामा किया।

ओलंपिक रजत पदक विजेता मीराबाई ने 190 किग्रा (85 किग्रा स्नैच + 105 किग्रा क्लीन एंड जर्क) का कुल वजन उठाकर गेम्स रिकॉर्ड बनाया। उन्होंने स्नैच, क्लीन एंड जर्क और कुल वजन तीनों में नए गेम्स रिकॉर्ड भी स्थापित किए।

मणिपुर के साधारण परिवार से आने वाली मीराबाई के पिता मजदूर थे, जबकि उनकी मां एक छोटी चाय की दुकान चलाती थीं। ग्लासगो में मिली इस जीत के साथ उन्होंने अपने शानदार करियर में कॉमनवेल्थ गेम्स का चौथा पदक भी जोड़ लिया।

लवलीना बोरगोहेन (गोलाघाट, असम)

रजत पदक - महिला 75 किग्रा मुक्केबाजी

ओलंपिक कांस्य पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ने आखिरकार कॉमनवेल्थ गेम्स में अपना पहला पदक जीत लिया। उन्होंने महिला 75 किग्रा वर्ग में रजत पदक अपने नाम किया।

असम के गोलाघाट जिले के बारोमुखिया गांव की लवलीना ने सेमीफाइनल में तुवालू की टारोना ताफाकी को आसानी से हराया। हालांकि, स्वर्ण पदक मुकाबले में उन्हें ऑस्ट्रेलिया की एम्मा-सू ग्रीनट्री से हार का सामना करना पड़ा। इससे पहले वह गोल्ड कोस्ट 2018 और बर्मिंघम 2022 में मामूली अंतर से पदक से चूक गई थीं।

ऋषिकांत सिंह (इम्फाल, मणिपुर)

रजत पदक - पुरुष 60 किग्रा वेटलिफ्टिंग

ऋषिकांत सिंह ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को वेटलिफ्टिंग का पहला पदक दिलाया। उन्होंने पुरुष 60 किग्रा वर्ग में 264 किग्रा (121 किग्रा स्नैच + 143 किग्रा क्लीन एंड जर्क) का कुल वजन उठाकर रजत पदक जीता।

मणिपुर के नगाइहाकतांग माखा मानिंग लेइकाई गांव में पले-बढ़े ऋषिकांत ने परिवार की मदद के लिए कभी सड़क किनारे ढाबे पर 150 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी की। वह बर्तन धोते थे, पानी की बाल्टियां उठाते थे और निर्माण कार्य भी करते थे।

सालों के संघर्ष के बाद उनकी मेहनत का फल उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम पर रजत पदक के रूप में मिला।

जादुमणि सिंह (इम्फाल, मणिपुर)

रजत पदक - पुरुष 55 किग्रा मुक्केबाजी

जादुमणि सिंह ने अपने पहले ही कॉमनवेल्थ गेम्स में पुरुष 55 किग्रा मुक्केबाजी स्पर्धा में रजत पदक जीतकर शानदार शुरुआत की। फाइनल में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के जाय डिक्सन से हार का सामना करना पड़ा।

इम्फाल के पास स्थित इरोइशेम्बा गांव के रहने वाले जादुमणि का सपना शुरुआत में फुटबॉलर बनने का था। बाद में उनके चाचा ने उन्हें मुक्केबाजी से परिचित कराया।

उनके करियर का अहम मोड़ तब आया, जब एक जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भारतीय बॉक्सिंग दिग्गज एमसी मैरी कॉम और सरिता देवी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उभरते खिलाड़ियों को नकद पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया।

इसी प्रेरणा ने जादुमणि को मुक्केबाजी को गंभीरता से अपनाने के लिए प्रेरित किया और वही सफर उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम तक ले आया।

बिंदियारानी देवी (इम्फाल, मणिपुर)

कांस्य पदक - महिला 58 किग्रा वेटलिफ्टिंग

बिंदियारानी देवी ने महिला 58 किग्रा वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर लगातार दूसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक हासिल किया। इससे पहले उन्होंने बर्मिंघम 2022 में 55 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीता था।

मणिपुर के एक किसान परिवार में जन्मीं बिंदियारानी, मीराबाई चानू से प्रेरित होकर वेटलिफ्टिंग में आईं। उन्होंने 199 किग्रा (87 किग्रा स्नैच + 112 किग्रा क्लीन एंड जर्क) का कुल वजन उठाया। स्नैच के तीनों प्रयास सफल रहने के बाद उन्होंने क्लीन एंड जर्क में निर्णायक वजन उठाकर एक और कॉमनवेल्थ गेम्स पदक अपने नाम किया।